
प्रतिनिधी द्वारा : – एक बेहद दुर्लभ और सख्त आदेश में, बॉम्बे उच्च न्यायालय ने अहंकार से प्रेरित मानहानि के एक मामले की सुनवाई को सीधे वर्ष 2046 तक टालने का निर्देश दिया है, भले ही वादी की उम्र 90 वर्ष के करीब क्यों न हो।
न्यायमूर्ति जितेंद्र जैन की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि यह विवाद व्यक्तिगत अहंकार का परिणाम है, जो वर्षों से अदालत का समय और संसाधन व्यर्थ कर रहा है। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे मामले न्याय व्यवस्था को बाधित करते हैं और उन मामलों की सुनवाई में देरी करते हैं जिन्हें वास्तव में प्राथमिकता की आवश्यकता होती है। कोर्ट ने पहले सुझाव दिया था कि बिना शर्त माफी मांगकर इस विवाद को खत्म किया जा सकता है, लेकिन करीब 90 वर्षीय वादी ने केस जारी रखने पर जोर दिया। इस पर सख्त रुख अपनाते हुए अदालत ने कहा कि: “इस मामले को अगले 20 वर्षों तक नहीं उठाया जाना चाहिए।”
अदालत ने साफ निर्देश दिया कि इस केस की सुनवाई 2046 से पहले नहीं होगी और वरिष्ठ या अति वरिष्ठ नागरिक होने के आधार पर भी कोई प्राथमिकता नहीं दी जाएगी।
यह मामला तारिणीबाहेन देसाई बनाम किलकिलराज भंसाली से जुड़ा है, जिसमें अदालत ने दिनांक २८/०४/२०२६ को यह असाधारण फैसला सुनाया।
निष्कर्ष: हाई कोर्ट के इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि व्यक्तिगत अहंकार से जुड़े मामलों के लिए न्यायालय का समय बर्बाद नहीं किया जा सकता, चाहे वादी की उम्र कुछ भी हो।




